Success Tips : बुरे वक्त में कभी हार न मानने की प्रेरणा है, जीवन के ये चार दिलचस्प किस्से

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आज की भौतिकवादी दुनिया ऐसी है कि किसी के पास छोटी-सी भी चीज होती है, तो उसे गुमान होने लगता है। अपनी पहचान बना पाने में नाकामयाब रहने वाले लोग अक्सर अपने पिता, भाई, मां आदि रिश्तेदार की पहचान का फायदा उठाकर गुमान पाले बैठते हैं लेकिन भौतिकवादी इस दुनिया से परे एक वैज्ञानिक थे, जगदीश चंद्र बसु (जे सी बोस)। पौधों में भी भावनाएं होती हैं, ये बात सबसे पहले उन्होंने ही साबित की थी। हम उनके जीवन से कई बातें सीख सकते हैं।

 

अपनी पिता की पहचान का नहीं उठाया फायदा 
जगदीश का जन्म 30 नवंबर 1858 में तत्कालीन बंगाल के मेमनसिंह नगर के पास स्थित ररौली गांव में हुआ था। यह इलाका अब बांग्लादेश में है। इनके पिता भगवान चंद्र बसु एक डिप्टी मजिस्ट्रेट थे, लेकिन जगदीश ने कभी भी उनकी पहचान का फायदा नहीं उठाया और अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। जगदीश के बाल मन पर उनकी सादगी का काफी प्रभाव पड़ा था। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही स्थित एक विद्यालय से प्राप्त की।

 

अपने हक के लिए लड़ना 
लंदन से वापस आने के बाद 1985 में बसु कलकत्ता के प्रसीडेंसी कॉलेज में भौतिकी के असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में काम करने लगे। उस समय भारतीय शिक्षकों को अंग्रेजों की तुलना में काफी कम वेतन दिया जाता था। जगदीश चंद्र ने इसका विरोध किया और तीन वर्ष तक बिना कोई वेतन लिए काम करते रहे। वेतन न लेने की वजह से उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई। उन पर कर्ज भी हो गया था, जिसे चुकाने के लिए उन्हें अपनी पैतृक जमीन तक बेचनी पड़ी थी।आखिरकार बसु की ज़िद के आगे ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। तब सरकार ने उनकी नियुक्ति की तारीख से लेकर पूरा वेतन उन्हें दिया।

 

नई चुनौतियों से कभी नहीं घबराना 
अपने प्रयोगों से उन्होंने साबित कर दिया कि पेड़-पौधों में भी जान होती है और वे भी सांस लेते हैं। पौधों की वृद्धि को मापने के लिए बोस ने एक अत्यन्त संवेदी यंत्र बनाया। उन्होंने इस यंत्र को क्रेस्कोग्राफ नाम दिया। बसु ने दर्शाया कि पौधों में भी हमारी तरह ही दर्द का एहसास होता है। अगर पौधों को काटा जाए या फिर उनमें जहर डाल दिया जाए तो उन्हें भी तकलीफ होती है और वह मर भी सकते हैं। प्रेसीडेंसी कॉलेज में उन्होंने 1915 तक अध्यापन का कार्य किया था। प्रेसीडेंसी कॉलेज से अगल होने के बाद साल 1917 में इन्होंने कलकत्ता में बोस रिसर्च इंस्टिट्यूट की स्थापना की और 1937 तक इसके निदेशक रहे।

 

अपनी पहचान को स्वीकार करना 
जगदीश बसु ने कई विदेशी यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई की, इस दौरान उन्होंने कई देशों में अध्ययन काम भी किया लेकिन वो भारत के निवासी होने की पहचान पर गर्व ही करते थे।  उन्होंने कभी भी अपनी पहचान छुपाने की कोशिश नहीं की। उन दिनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि अच्छी नहीं समझी जाती थी।  भारत को एक पिछड़ा हुआ देश माना जाता था लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी असल पहचान को स्वीकारते हुए नए कीर्तिमान स्थापित किए।

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